
संत समिति रायपुर महानगर छ.ग. की एक बैठक संपन्न हुई जिसमें निम्नांकित बिंदु पर चर्चा कर सरकार को अवगत कराया गया।
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्यागीर्वाण भारती। दिव्य संस्कृत भाषा भाषाओं में मुख्य और मधुर है। यह भारत की संस्कृति की परिचायक है। प्राचीन ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों सहित ज्ञान, विज्ञान, साहित्य कला आदि साहित्यों की रचना संस्कृत भाषा में हुई है। यह पावन और पवित्र भाषा जिससे भारत की आत्मा जुड़ी है। इस भाषा के ज्ञान के माध्यम से प्राचीन जीवन मूल्यों का अनुसरण संभव है।
संस्कृत न केवल भारतीय भाषाओं की प्रत्युत संसार की अन्यान्य भाषाओं की जननी मानी जाती है। देश की एकता और अखंडता की रक्षा में संस्कृत का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। किसी भी देश की आत्मा वहीं की संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति संस्कृत भाषा में सन्निहित है। यह सत्य है – भारतस्य प्रतिष्ठे वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा। संस्कृत का संरक्षण पहुँचाने की प्रक्रिया में जुड़ना अथवा इस अभियान में संवर्धन इसका प्रचार-प्रसार तथा जन-जन तक सम्मिलित होने जैसा सुदर उपक्रम होगा। आइये अपने छत्तीसगढ़ राज्य में सस्कृत को प्रगति की अपनी किसी न किसी रूप में भूमिका का निर्वाह किया जाना एक पवित्र सारस्वत अनुष्ठान में दिंशा में अपना दायित्व निर्वहन करें।
1 . गैर अनुदान प्राप्त संस्कृत विद्यालयों में पढ़ाने वालों शिक्षकों को सम्मान जनक आर्थिक सहयोग दिया जाना चाहिए।
2. संस्कृत पाठशालाओं को उनके अनुकूल वातावरण के अनुसार गुरुकुल के रूप में विकसित करने के रूप में आर्थिक सहायता दी जाये।
3. संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार की व्यवस्था की जाये ।
4. राज्य के महाविद्यालयों में संस्कृत विषय प्रारंभ करें। पहली कक्षा से ही संस्कृत विषय को अनिवार्य करना चाहिए पूर्व माध्यमिक कक्षाओ में संस्कृत के शिक्षको की स्वतंत्र भर्ती की जाएँ साथ ही व्यावसायिक शिक्षा को संस्कृत के विकल्प के रूप में न रखा जाये ।
5. छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामण्डलम द्वारा उक्त कार्यों के क्रियान्वयन के लिए उनकी अनुदान राशि में वृद्धि की जाये। संस्कृत विद्यार्थी को संस्कृत विद्यामण्डलम के माध्यम से ही आर्थिक सहयोग मिलना चाहिए।
6. संस्कृत जनभाषा वनाने के दिशा में संस्कृत सम्भाषण प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया जाये ।
7. संस्कृत को सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के आयोजनों में ‘सहभाग दिया जाये।
8. राज्य के विद्यालयों में पदस्थ संस्कृत अध्यापकों को निरन्तर प्रशिक्षण दिया जाये।
9. संस्कृत के प्रचार-प्रसार के संबंध में राज्य के संस्कृत विद्वानों से मार्गदर्शन लिया जाये।
10. प्रदेश में संस्कृत विद्यालय प्रारंभ करने के लिए प्रेरक वातावरण निर्माण किया जाये।
छत्तीसगढ़ राज्य में संस्कृत को सम्मानपूर्ण स्थान मिले इसके लिए सरकार की ओर से पर्याप्त आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है।
उपरोक्त बात की जानकारी संत महासभा प्रदेश प्रवक्ता भागवताचार्य रूपेश महराज जी द्वारा दी गई जिसमें प्रमुख रूप से स्वामी परमात्मानंद जी महाराज के मुख्य संरक्षण में, भारत सेवा आश्रम के संत स्वामी शिवरुपानंद जी महाराज ,पुज्य शदानी दरबार के महंत डॉ युधिष्ठिर लाल जी महाराज, श्री बीरंची नारायण मंदिर के महंत स्वामी देवा दास जी महाराज, लक्ष्मी नारायण मठ के महंत डॉ स्वामी वेदप्रकाशाचार्य जी महराज, सुरेश्वर महादेव पीठ के संस्थापक डॉ स्वामी राजेश्वरानंद जी महराज, किन्नर अखाड़ा महामंडलेश्वर साध्वी सौम्या दीदी माँ, अजीवन निराहार संत स्वामी गौतमानंद महाराज, महंत सौरभ दास, महामंडलेश्वर जीतेंशवरानंद जी महाराज, नाथ संप्रदाय के छग प्रांत प्रमुख भारत नाथ योगी, भागवताचार्य मोहन महाराज, भागवताचार्य सत्यनारायण तिवारी, भागवताचार्य रवीन्द्र शास्त्री, भागवताचार्य दिलेश शास्त्री,भागवताचार्य हिमांशु शास्त्री, भूषण साहू।








